वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में हाल के दिनों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। आमतौर पर कड़े रुख के लिए पहचाने जाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के प्रशासन ने रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में अचानक ढील देने के संकेत दिए हैं। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल बढ़ गई है और भारत के लिए भी यह एक अहम आर्थिक राहत के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका की ओर से उठाए गए इस कदम के बाद भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए अस्थायी अनुमति मिल गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को सस्ता कच्चा तेल मिलने की संभावना बढ़ गई है।
रूसी तेल पर और प्रतिबंध हटाने की तैयारी
अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने संकेत दिया है कि अमेरिका कुछ और रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने पर विचार कर सकता है। उन्होंने कहा कि समुद्र में बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल जहाजों पर फंसा हुआ है और प्रतिबंधों के कारण वह बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा है।
उनके मुताबिक अगर इन प्रतिबंधों में तकनीकी ढील दी जाती है तो यह तेल वैश्विक बाजार में पहुंच सकेगा और सप्लाई बढ़ने से कीमतों में राहत मिल सकती है।
तेल बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति
अमेरिका का कहना है कि यह कदम रूस को राहत देने के लिए नहीं बल्कि वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए उठाया जा रहा है। रूस पर लगाए गए प्रतिबंध मुख्य रूप से यूक्रेन युद्ध के कारण लगाए गए थे।
हालांकि अब जो छूट देने की बात हो रही है, वह केवल उस कच्चे तेल के लिए होगी जो पहले से जहाजों पर लदा हुआ है या ट्रांजिट में है। इससे बाजार में तुरंत सप्लाई बढ़ाई जा सकेगी और कीमतों पर दबाव कम करने की कोशिश की जाएगी।
भारत को मिली विशेष अस्थायी अनुमति
अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में भारत को मॉस्को से तेल खरीदने के लिए अस्थायी छूट दी है। इस अनुमति के तहत समुद्र में फंसे रूसी तेल के सौदों को 3 अप्रैल 2026 तक मंजूरी दी गई है।
इसका मतलब यह है कि प्रतिबंधों के कारण जो तेल जहाजों पर रुका हुआ है, उसे भारत खरीद सकता है। इससे भारत को कम कीमत पर कच्चा तेल मिलने की संभावना बढ़ेगी और आयात लागत में कमी आ सकती है।
अचानक नरम क्यों पड़ा अमेरिका
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका का यह फैसला पूरी तरह रणनीतिक और आर्थिक मजबूरी से जुड़ा हुआ है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ संघर्ष के कारण खाड़ी क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।
खासकर Strait of Hormuz से गुजरने वाला तेल परिवहन प्रभावित होने से वैश्विक बाजार में सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का व्यापार इसी समुद्री रास्ते से होता है।
इस स्थिति के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है और एक ही सप्ताह में लगभग 30 प्रतिशत तक उछाल देखा गया। बढ़ती कीमतों का असर अमेरिका के घरेलू बाजार और महंगाई पर भी पड़ रहा है, जो सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ता है।
रूसी तेल पर मिली यह अस्थायी छूट भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि प्रतिबंधों के कारण फंसा हुआ तेल अक्सर भारी छूट पर उपलब्ध होता है। इससे भारत को कम कीमत पर तेल खरीदने का अवसर मिल सकता है और आयात बिल में भी राहत मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में भारत ने संतुलित कूटनीतिक नीति अपनाई है। उसने एक ओर अमेरिका से टकराव नहीं लिया और दूसरी ओर रूस के साथ ऊर्जा सहयोग भी जारी रखा, जिसका फायदा अब वैश्विक परिस्थितियों के बीच मिलता दिखाई दे रहा है।
